
40 दिन की जंग के बाद जो 2 हफ्तों की राहत मिली थी…अब वही राहत “टाइम बम” बनती दिख रही है। शांति आई जरूर… लेकिन भरोसा नहीं आया। और अब सवाल ये है—क्या ये सीजफायर टिकेगा या फिर गोलियां फिर बोलेंगी?
इस्लामाबाद मीटिंग: उम्मीद टूटी, तनाव बढ़ा
Islamabad में हुई अहम वार्ता से सबको उम्मीद थी— लेकिन नतीजा? शून्य। कोई समझौता नहीं… कोई ठोस घोषणा नहीं… बस कूटनीतिक चुप्पी और बढ़ता हुआ अविश्वास। जब टेबल पर बात खत्म हो जाती है, तो मैदान में तनाव शुरू हो जाता है।
रिपोर्ट का दावा: दरवाजे अभी भी खुले हैं
अब भी सुलह की गुंजाइश पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। बैकडोर डिप्लोमेसी जारी, क्षेत्रीय देशों की मध्यस्थता, सीजफायर बढ़ाने की कोशिश। शांति का दरवाजा बंद नहीं हुआ… लेकिन आधा खुला जरूर है।
ईरान की नई शर्त: “रवैया बदलो”
राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने साफ कहा, अगर अमेरिका अपना “साम्राज्यवादी रवैया” छोड़े, तो समझौते का रास्ता खुल सकता है।
विदेश मंत्री का वार: “सद्भावना का जवाब नहीं मिला”
Abbas Araghchi ने सीधे आरोप लगाया— ईरान समझौते के करीब था, लेकिन अमेरिका ने रुख बदल दिया। उन्होंने लिखा, “सद्भावना से सद्भावना उत्पन्न होती है… शत्रुता से शत्रुता।”
अमेरिका की रणनीति: दबाव या समाधान?
अमेरिका की तरफ से कोई स्पष्ट नरमी नहीं दिख रही। स्ट्रेटेजी अभी भी “प्रेशर पॉलिटिक्स” पर टिकी है। सवाल यही है क्या दबाव से शांति आएगी या फिर टकराव और बढ़ेगा? हर दबाव शांति नहीं लाता… कुछ दबाव विस्फोट भी कराते हैं।
क्या सीजफायर बढ़ेगा?
अभी तीन संभावनाएं हैं:
- सीजफायर बढ़ सकता है
- सीमित तनाव जारी रहेगा
- या फिर… जंग दोबारा शुरू
अभी सब कुछ “होल्ड” पर है न पूरी शांति… न पूरी जंग। लेकिन इतिहास गवाह है ऐसे हालात ज्यादा देर टिकते नहीं। या तो समझौता होगा… या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा।
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